# बिगड़हा के जमाना
# बिगड़हा के जमाना
जेन ह रहिथे कमइया,तेखरे सो सब कमवाथे।
जेन ह रहिथे बिगड़े बागड़े, तेला सब चलाथे।
सिधवा रहे म कोनो फायदा नइ हे आज ,
जेन रहिथे नंगरा लबरा, उहि ला सब डर्राथे।
सोझ सोझ पेड़ ,कटा जाथे झट कन।
टेडगा-बेडगा पेड़ ल,नइ देखय सब झन।
बिगड़ जव कहिके नइ कहातंव संगी,
फेर चुप रहइया ल कोंदा,कहि देथे सब झन।
© आशुतोष साहू, नारायणपुर(मारो)
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें