किसान

# किसान
देश कृषि प्रधान है, और मर रहा किसान है।
दोगली व्यवस्था है, सब जान कर अनजान है।

व्यवस्था की असफलता का, ये बड़ा प्रमाण है।
फांसी पर रोज तजता, किसान अपना प्राण है।

फसल अच्छी या बुरी हो, घाटे में किसान है।
कैसा ये अर्थशास्त्र है, कैसा थोथा ज्ञान है।

बीमा कम्पनी मालामाल , मुवावजे ,नहीं-समान हैं।
किसान  संकटग्रस्त है , जमाखोरों का  सम्मान है।

सीधे-साधे किसान है, राजनीति से अनजान हैं।
फसल की सही क़ीमत ,बस यही अरमान है।

फाँसी पर चढ़ते रहते ,  रोज क्यों किसान हैं?
जीवन से अधिक प्रिय, क्योंकि अपना सम्मान है।

कर्ज के तगादे और जमीन की कुर्की से,जो परेशानहै।
खेती नामक जुआ खेलता, मेरे देश का  किसान है।

सरकार किसी दल की हो, दशा एक समान है।
माटी में ही मिल रहा, माटी की संतान है ।

आशुतोष साहू
नारायणपुर, जिला- बेमेतरा(छ. ग.)

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