उम्र जैसे जैसे बढ़ी, सियासतदानों के कई रंग देखे। गिरगिट भी शरमा जाये,ऐसे इनके बदलते ढंग देखे। बातें जिन उसूलों की, दिन रात करते थकते नहीं थे, रातोंरात कुर्सी की खातिर,छोड़ विपक्षियों के संग देखे।
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