हनुमान जी लंका में
हनुमान जी लंका में
भूल कर अपनी शक्ति को, हनुमत चुपचाप बैठे थे।
होगा कैसे समुद्र पार, सब यही आपस में कहते थे।।
जामवंत ने बलविक्रम की, याद दिलायी मारुति को।
ऋषियों के शाप से जो, भूल चुके थे पवन गति को।।
तब हनुमत हुंकार भरे, ले राम नाम वो छलांग भरे।
थे अनहोनी सबही कहते,राम कार्य सागर लांघ करे।।
वृक्ष तले मुरझायी सी, दुःखी बैठी थी माता सीता।
कौन कहेगा रघुवर से, यह सब जो मुझ पर बीता।।
एक मुद्रिका तभी,अचानक वृक्ष से नीचे टपकी।
अंकित जिस पर ,राम नाम,जो थी स्वयं रघुवर की।
राम का सेवक हूँ माते, मुद्रिका यह प्रमाण लाया।
'अजर अमर रहो हनुमत',माता का आशीष पाया।।
भूख बहुत लगी, माते, एक फल क्या तोड़ खालूं।
उड़ते उड़ते थक गया, इनसे अपनी क्षुधा मिटालूं।।
हां हां पुत्र क्यों नहीं, सुन हनुमत फल खाने लगे।
वृक्षों पर वानर देख कर, राक्षस सब भगाने लगे।।
वृक्षों को तोड़ फेंका,फलों को जी भर के खाया।
मन का सारा कोप ही,सुंदर वाटिका पर उतर आया।।
उत्पात की बातों को सुन, रावण अति क्रोधित हुआ।
बलशाली राक्षसों को भेजा,जो भी आया चित्त हुआ।।
रावण दुलारा अक्षय कुमार, हनुमत द्वारा मारा गया।
वानर बस समझने की भूल से, जान से बेचारा गया।।
प्रतापी रावण पुत्र तब,क्रोधित होकर मेघनाथ आये।
नागपाश का सम्मान कर,हनुमान उसके साथ आये।।
देखने उस वानर को,लंका की प्रजा सारी उमड़ पड़ी।
रामदूत इस वानर के, पराक्रम से हुवी विस्मित बड़ी।।
क्रोधित दशानन ने कहा,पुँछ वानर को सबसे प्रिय होता।
लगा दो इस पर आग,यह वानर उछले फिरे रोता रोता ।।
लगी आग पूंछ पर, हनुमत भवनों पर छलांग लगाने लगे।
रावण को जिस पर,था अभिमान उस लंका जलाने लगे।।
जय हनुमान जी की।। जय श्री राम।।
©आशुतोष साहू
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