संक्रमण काल

# संक्रमण-काल
सुना था नाम केवल,
जीवन का, मृत्यु का,
पर इस मोड़ पर आ,
जान पाया, एक और अवस्था,
संक्रमण इन दोनो का,
जब आशाएं मृत्यु शैय्या पर लेटी,
पल पल हिचकती सांसे लेती,
जान पड़ती है मरी-सी,
जब कल्पनाओं के कांच में भरे,
रंगीन सपने फैल जाते हैं,
वास्तविकता के धरातल पे,
जब लहूलुहान हो जाता है मन,
न अनुभव हो कंटीले दुखों के चुभन,
आदमी जी कर भी,
हर पल मरता है,
मन सोंचा करता है,
ये जीवन है या मृत्यु,
या संक्रमण इन दोनों का।

© अशुतोष साहू,
नारायणपुर,(मारो)
बेमेतरा छ ग.

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