जल
जल तुम कितने निष्ठुर हो,
बदल तो कितने क्रूर हो,
खेतों में जब फसलें सुखी,
आंखों में जब पानी आये,
बस रहते थे छाए,
तुमनें न पानी बरसाए,
दिख जाते थे क्षण भर को,
~जल तुम कितने निष्ठुर हो,
बदल तो कितने क्रूर हो,
विनाश की मदहोशी में,
कभी रूप में कोसी के,
बहा दिया कितनो के घर को,
डूबा दिया कितनें जीवन को,
सताते कृषक-मजबूर को
~जल तुम कितने निष्ठुर हो,
बदल तो कितने क्रूर हो
पीड़ित को तुम पीड़ा देते,
दुख तो तुम्हारी क्रीड़ा जैसे,
यदि साकार मानव होते,
जानते, ये जीते है कैसे।
जानते अभाव क्या होता है,
गरीबी का घाव क्या होता है,
इन बातों से बहुत दूर हो...
~जल तुम कितने निष्ठुर हो,
बदल तो कितने क्रूर हो
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