मैं कब बड़ा हो गया
मैं कब बड़ा हो गया,
मुझे पता नहीं,
लेकिन वो ज़िम्मेदारीयाँ,
जिन्हें सोंच कर कांप जाता था मैं,
धीरे धीरे आ रहे हैं,
मेरे कंधों पर,
फिर भी मुझे लगता है,
मैं वही हूँ,
जो खेलता था गलियों में,
जो लड़ता था,
रोता था,
हँसता था,
छोटी छोटी बातों पे,
मैं आज भी जाना चाहता हूँ,उस दुनिया मे,
मैंने यथार्थ से मिच कर आंखें,
कई बार कोशिश भी, की,
मगर यथार्थ से ही,
टकरा जाता हूं,
जैसे कोई पारदर्शी कांच,
जा नही पाता हूँ।
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