यादों के नगर में
#यादों के नगर में
जब भी मन पाता है एकांत,
विचरने लगता है , यादों के नगर में,
जहाँ देखता हूं ,उस खिड़की के
पास वाले बैंच को,
जहां तुम बैठा करती थी,
देखता हूं उस मैदान को,
जहां तुमने वो होली खेली थी,
देखता हूं उस तालाब के घाट को,
जहां मेरी दौड़ती सी नज़र,
तुम्हे खोजा करती थी,
देखता हूँ उस बिगड़े हुए बोरिंग को,
जहां तुम पानी भरती थी,
देखता हूँ उस अधखुले दरवाजे को,
जिसके पीछे तुम्हारे होने की,
आशा रहती थी।
© आशुतोष साहू
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