भोर

भोर  हो चली , हुआ उजाला ,
कृषक चले खालिहानों  को ,
चीडियों ने भी पंख उघारे ,
निल गगन उड़ जाने को,
तू भी उठ जीवन जी ले,
समय नही व्यर्थ गवाने को,
बीता क्षण फिर न आयेगा,
कुछ न रख पछताने को,

पृथ्वी की हर घांस सजी है ,
ओस कणोँ के मोती से ,
पुरब से निकले सूरज भी ,
बूझे दीपक  में ज्योति से ,
तेरी  निन्दियायी आँखों ने ,
देखे होंगे कुछ सपने ,
प्रयास की छैनी हांथों में ले ,
आ निकल चलें उनको गढ़ने.
~सब ओर चीडियों का शोर हुआ,
आ निकल चलें आ भोर हुआ ...
©आशुतोष साहू

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट