गरीब का जीवन

गरीब का जीवन,
जैसे बुखार से तपता तन,
हर पल परेशान।
जरूरतों से हलाकान ।
राही भटकता जैसे,
कांटों भरा वन।

चाहता है सुकून की जिंदगी।
बच्चों को पढ़ाने की आस लगी,
पर बड़े डिग्रीयां है,पैसो की बंदी।
समान अधिकार के नाम पर ठगी।
मतों के बाजार में चुनाव की मंडी।
लोकतंत्र गरीबी नही,पहुच देखती।
सब देखते मौन..

कुदाल, फावड़े साथ खड़े,
बाजू भी , मेहनत को अड़े,
किस्मत  बदलने की राह खड़े,
चुनौती से लड़ते, भिड़ते ,जूझते।
जीवन पथरीला फिर भी चलते।
मजबूत बन...

अस्पताल देखे ना कोई गरीब।
जो देखे उसके खोंटे  नसीब,
सरकारी अस्पताल है बेतरतीब,
डॉक्टर रहते पैसे वालों के करीब।
निजी अस्पताल का हाल अजीब,
हों पास पैसे तो इलाज नसीब।
वर्ना मौत कगार पर , अब-तब,
मृत्यु वरण..

ऋण साहूकारों का मकड़जाल,
ऋण बैंक का सरल,
पर खेती परची गिरवी डाल,
खेती ज़ब्त, जब न पट पाये,
जो पड़े अकाल दुकाल,
बड़े ब्यापारी करते बैंक का ,अंदर माल,
बनते दिवालिया , दिखावे का  कंगाल,
ठगे जाते गरीब किसान ..

©आशुतोष साहू, नारायणपुर





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